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Tuesday, 10 May 2011

सच साबित हुई आशंका..........

जैसा की मैने पहले ही आशंका जताई थी, केंद्र सरकार की जांच रिपोर्ट में बिल्कुल वैसा ही तथ्य निकलकर सामने आया है। हैलीकाप्टर हादसे में अरुणाचल के मुख्यमंत्री की मौत की जांच में ये बात सामने आई है अरुणाचल प्रदेश के सीमा पर उड़ान भरने वाले विमानों की फ्रीक्वेंसी जाम कर दी जाती है, और ये सब कुछ होता है सीमा पार यानि ड्रेगन के इलाके से।
खुफिया जांच के अनुसार पिछले लंबे समय से राज्य में चीन के सीमावर्ती इलाके में उड़ने वाले हैलीकाप्टरों और छोटे विमानों के सिग्नल जाम हो जाते हैं और इससे विमान रास्ता भटक जाता है।
अरुणाचल के सीएम के हैलीकाप्टर के साथ भी कुछ एसा ही हुआ है क्योंकि केंद्र सरकार के खुफिया सूत्रों का कहना है खांडू को लेकर उड़ रहे हैलीकाप्टर की उड़ान के दौरान सीमा पार से आने वाले सिग्नलों को डिकोड किया गया है जिसमें ये आशंका जताई जा रही है कि उड़ान के दौरान पवनहंस हैलीकाप्टर को रास्ता बताने और निर्देशित करने के लिए मिलने वाले सिग्नल जाम हो गये थे और हैलीकाप्टर रास्ता भटककर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। कैबीनेट सचिवालय ने इस मामले में सेना से भी रिपोर्ट मंगाई है।

Wednesday, 4 May 2011

अरुणाचल प्रदेश के तीन हैलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त....हादसा या साजिश


अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री की हैलीकाप्टर दुर्घटना में मौत हो गई, उस इलाके में होने वाली ये तीसरी हवाई दुर्घटना है। सभी का कहना है कि ये खराब मौसम की वजह से हो रहा है...मेरी एक आशंका है..वहां से कुछ ही दूरी पर चाइना का बेस कैंप भी है, चोरी छिपे चाइना के सैनिकों ने वहां एक हवाई पट्टी भी बना ली है....अरुणाचल प्रदेश को वो अपने नक्शे में भी दिखाते हैं।मामला गंभीर है, यदि एसा ना होता तो खांडू के लापता होने के तुरंत बाद ही सोनिया गांधी यूपीए के दो मंत्रियों को जांच करने के बहाने अरुणाचल ना भेजती। बहरहाल मेरी ये बातें संभावना और संरचना के साथ लगातार उस इलाके के दुर्घटनाओं के बाद की उपज हैं, हो सकता है ये महज एक सोच हो, या फिर कुछ और.........आप का क्या कहना है

Tuesday, 28 December 2010

ज़रा शर्म करो.............



अंबिकापुर में स्वास्थ्य विभाग करोड़ों रुपये खर्च कर जिला अस्पताल की सुविधाएं बढ़ाने की कोशिश कर रही है...लेकिन इसी अस्पताल के सामने एक व्यक्ति इलाज के अभाव में तड़प तड़प दम तोड़ देता है और कोई भी उसकी सुध नहीं लेता है...यहां तक की उसकी लाश को देखकर भी लोग अनदेखा करते गये...आखिरकार जब पुलिस को इस बारे में सूचना दी गई तब कहीं जाकर लाश को सड़क से हटाया गया और इस दौरान पांच घंटे तक एक व्यक्ति की लाश यूं ही भरे बाजार में लावारिस सी पड़ी रही।

३०० बिस्तरों वाले सुपर स्पेशलिटी का दर्जा प्राप्त अंबिकापुर जिला अस्पताल में कुछ दिनों पहले ही मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 76 लाख रुपये की लागत से ओपीडी भवन का उद्घाटन किया। इसके पीछे सरकार की ये सोच सबके सामने रखी गई की नये ओपीडी भवन में ज्यादा मरीजों को देखा जा सकेगा। दरअसल अस्पताल की बाहरी साज सज्जा करके इसको आईएसओ की मान्यता दिलाने की पूरी कोशिश की जा रही है। तय है इसमें अस्पताल प्रबंधन सफल भी हो जायेगा, लेकिन सवाल ये है की आखिरकार ये सब किसके लिए, जवाब आयेगा मरीजों के लिए...लेकिन हकीकत तो ये है की यहां मरीजों की कोई सुनवाई ही नहीं है...यकीन ना आये तो इस लाश को देखिये जो पांच घंटे से इसी अस्पताल के सामने से होकर गुजरने वाली सड़क पर पड़ी है...इस व्यक्ति को गैंगरीन की बीमारी थी, पैसे के अभाव में ये इलाज नहीं करा पाया और आखिरकार अस्पताल के सामने ही इसने अपना दम तोड़ दिया।

गैंगरीन की बीमारी की वजह से इस व्यक्ति का पैर सड़ गया था और कई दिनों से ये व्यक्ति इसी अस्पताल में अपना इलाज कराने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मरीजों की सेवा करने का दावा करने वाले जिला अस्पताल में इस मरीज के लिए जगह की कमी थी और आखिरकार इलाज के इंतजार में जीवन की तलाश करता ये शख्स मौत की नींद सो गया.....अस्पताल के बाहर सड़क पर पड़ी लाश से बदबू आ रही थी, फिर भी किसी ने ना तो इसके उपर कपड़ा डाला और ना ही अस्पताल ने इसकी कोई सुध ली...कई बार के फोन के बाद आखिरकार पुलिस घटनास्थल पर आई और इस लाश को सड़क से हटाकर अस्पताल के भीतर ही मर्चुरी में डाल दिया...साथ ही इसके बारे में पता कर परिजनो को भी मरने की खबर पहुंचा दी गई।

सड़क पांच घंटों के दौरान जिस तरह से हर राहगीर ने अपनी नाक बंद कर यहां से जल्दी गुजरने में भलाई समझी उससे यही लगा की मानवता शर्मसार हो गई है और किसी के दिल में कोई भी करुणा नहीं है, वहीं अस्पताल प्रबंधन को इस एक मौत से कोई फर्क नहीं पड़ा....पुलिस आई और अपना काम निपटाकर चलती बनी...आखिरकार इस व्यक्ति को अस्पताल में जगह मिल ही गई, लेकिन जीते जी इलाज के लिए नहीं बल्कि मरने के बाद पोस्टमार्टम के लिए...

काश...सुविधाएं देने का दावा करने वाले इसे अमल में भी लाते...


Wednesday, 7 April 2010

नक्सलवाद का असली चेहरा.........


छ्त्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलियों पर नकेल कसने के लिए जन सुरक्षा अधिनियम के नाम से एक एसा कानून बनाया जिसमें नक्सलियों से संबंध होने के शक पर भी पुलिस के पास ये अधिकार है कि वो संबंधित व्यक्ति को बिना किसी रिपोर्ट या सबूत के आधार पर गिरफ्तार करके जेल भेज सकती है, कई बड़ी हस्तियां इस अधिनियम की चपेट मे भी आये...इसके अलावा पत्रकारों से परेशान रहने वाली पुलिस ने इस कानून को पत्रकारों के प्रति भी हथियार के रुप में इस्तेमाल किया....नतीजा नक्सलियों की जो खबरें प्रेस के माध्यम से बाहर आती थीं, वो भी बंद हो गयी और नक्सलियो के द्वारा आमंत्रण मिलने के बाद भी प्रेस ने नक्सलियों से कन्नी काटना शुरु कर दिया और रही सही सूचनाएं और सरकार से बातचीत करने का एक बीच का रास्ता भी जाता रहा.......

खैर ये तो पुरानी बात हुयी.....लेकिन छः अप्रेल को दंतेवाड़ा के चिंतलनार में जो कुछ भी हुआ उसकी पृष्ठभूमि में भी जरुर ये बातें छिपी होंगी....

सभी को याद होगा की चिंतलनार हमले के कुछ घंटे पहले ही केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने नक्सलियों को कायर करार दिया था....जिसके बाद चिंतलनार में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के ७६ जवानों को मौत के रास्ते में ढकेल दिया.........इस घटना से अब एक बात तो साफ है कि सरकार को नक्सलवाद से अब आर पार की लड़ाई के लिए तैयार हो जाना चाहिये, क्योंकि अब नक्सलवाद का स्वरुप वैसा नहीं है जैसा की १९६७ में नक्सलबाड़ी मे चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने शुरु किया था.........तब मामला विकास और गरीबी से जुड़ा था, लेकिन अब नक्सलवाद का मतलब आतंक, रंगदारी और देशद्रोह हो चुका है.... एक तरफ जहां देश आतंकवाद से जूझ रहा है वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर अपने ही लोग जब विद्रोह पर उतर जायें और विद्रोही बनकर नक्सलवाद के रुप में देश के ही खिलाफ जंग में उतर जायें तो स्थिति को काबू करने में मुश्किलें आना लाज़मी है......

आंकड़ों की मानें तो देश के २० राज्यों के २२० जिलों में नक्सलवाद ने अपना पैर पसार लिया है, ये हिस्सा देश के भूभाग का कुल ४० फीसदी हिस्सा है, जो ये साबित करता है कि देश में नक्सलवाद का फैलाव यूं ही नहीं हुआ बल्कि इसका फैलाव एक सोची समझी रणनीति के तहत किया गया है......चिंतलनार में एक तरफ जवानों के पास जहां देशी हथियार थे तो वहीं नक्सलियों ने चीन के बने अत्याधुनिक हथियारों से हमला किया, नतीजा ये की मरने वाले जवानों की संख्या ७६ हो गयी लेकिन नक्सलियों में से किसी के भी घायल होने की खबर नहीं आयी....

जगदलपुर में शहीदों को श्रद्धांजली देते वक्त गृहमंत्री चिदंबरम की आंखें भर आयीं और उन्होंने आने वाले तीन सालों में नक्सलवाद को खत्म कर देने की बात कही है॥लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या नक्सलवाद की समस्या इतनी छोटी है जितनी की सरकार सोच रही है.......ये सवाल इसलिए उठता है क्योंकि अभी तक नक्सलवाद का असली चेहरा कहीं छिपा हुआ था जो अब दंतेवाड़ा में सबके सामने आ गया है, ये चेहरा ना केवल विकृत है बल्कि विभत्स सोच के साथ अपने मंजिल की तरफ भी धीरे धीरे बढ़ रहा है.........

Thursday, 14 January 2010

डीपाडीह और सामत सरना.......

छत्तीसगढ़ मे पर्यटन की अपार संभावनाएं है......प्रदेश का प्रत्येक कोना अपने आप मे एक विरासत को समेटे हुए है......इसी विरासत की कुछ कड़ियां छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र सरगुजा मे हैं......सरगुजा मे ना सिर्फ कुदरत के बनाये स्वाभाविक जलप्रपात हैं बल्कि पुरातत्व की भी वो निशानियां हैं जो शायद ही कहीं नजर आयें.....
छत्तीसगढ़ को फुलऑफ नेचर कहा जाता है...फिर चाहे वो आदिवासी सभ्यता हो,राष्ट्रीय अभ्यारण्य हो,नैसर्गिक जल प्रपात हो या फिर खजुराहो के समान आदिमकाल की प्रतिमाये हो...इनमें से भी पर्यटन की दृष्टी से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सरगुजा का अपना एक विशेष स्थान है...कभी दक्षिण कौशल का भूभाग रहा सरगुजा आज छत्तीसगढ़ के लिये अनमोल धरोहर है...जो अपने आप में एक अलग इतिहास को समेटे हुये है....सरगुजा में ना सिर्फ वन संपदा की भरमार है बल्कि प्रकृतिक रुप से भी ये पहाडियों से घिरा हुआ है...सरगुजा के मैनपाट को छत्तीसगढ़ का शिमला कहते है...इसके अलावा तमोर पिंगला अभ्यारण्य, केंदई जल प्रपात और छिंन्नमस्ता मां महामाया की नैसर्गिक सुंदरता देखते ही बनती है...
सरगुजा संभाग मध्यप्रदेश,उत्तरप्रदेश और झारखंड की सीमाओं को छत्तीसगढ़ से जोड़ता है...ये सीमाये सरगुजा के खासियत के अलावा नक्सल प्रभावित होने की वजह से कभी कभी नुकसान दायक भी साबित होती है...लेकिन सरगुजा किसी भी तरह के मुसीबतों का सामना करने को हमेशा ही तैयार रहा है....भगवान राम सीता और लक्ष्मण की इस नगरी पर भगवान शिव की आराधना राजाओं द्वारा की जाती रही है...जिसका उदाहरण डीपाडीह के सामंत सरना मंदिर से मिलती है....9वीं सदी से लेकर 13वी सदी के अवशेषों को अपने भीतर समेटे हुये डीपाडीह भारत के इतिहास को एक नई दिशा प्रदान करता है...साथ ही सरगुजा के वैभवशाली प्रभाव को भी दर्शाता है...डीपाडीह प्राचीन काल में भगवान शिव के आराधना का एक बडा केन्द्र था...साथ ही विभिन्न देवताओं की प्रतिमा ये बताती है कि कलचुरी और सामंती राजा भगवान शिव के बहुत बड़े उपासक थे....
सरगुजा के पर्यटन स्थलों में डीपाडीह का ना सिर्फ सभ्यता की निशानी माना जाता है बल्कि इसका इतिहास भी अतीत के पन्नों में ही छिपा रह गया....स्थानीय किवदंती की माने तो ये सामंत राजाओं की देव स्थली थी...और 9 वीं 10 वीं सदी में इस जगह की स्थापना हुयी थी....

कन्हर,गलफुल्ला और सूर्या नदी के संगम क्षेत्र में स्थित डीपाडीह प्राचीन काल में भव्य मंदिरों का नगर था....डीपाडीह का शाब्दिक अर्थ होता है...ऊंचाई पर बसा हुआ प्राचीन भग्न सन्निवेश....डीपाडीह के लगभग 1 किमी की परिधी में फैले हुये अवशेषों से साफ पता चलता है कि लगभग 8वीं सदी से लेकर 13वीं सदी तक ये जगह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कला केन्द्र के रुप में विकसित था...डीपाडीह की उत्पत्ती के बारे में प्राचीन इतिहास के अभिलेखों में भी कोई खास उल्लेख नही है....माना जाता है कि यहां पर सामंत राजा और पाटलीपुत्र के राजा टांगीनाथ के बीच भयानक युद्ध हुआ था...युद्ध में सामंत राजा हार गये जिन्होनें तालाब में कूदकर अपनी जान दे दी....
डीपाडीह की ये स्थानीय किवदंती पाटलीपुत्र के पालवंश के शासकों के आक्रमण और आधिपत्य का परिचायक है...माना जाता है कि डीपाडीह सामंत राजाओं की शिव आराधना का केन्द्र था...जहां भगवान शिव के विशालकाय मंदिर के साथ सैकड़ो छोटे छोटे मंदिर और दिवी देवताओं की प्रतिमायें स्थित है....सामंत राजा की मौत के बाद पाल वंश के शासक ने इस देवस्थल पर कब्जा किया और फिर समय के साथ सबकुछ जमीदोज हो गया....सन् 1988 में जब पुरातत्व विभाग की नजर यहां पर पड़ी तो पहाड़ के टीले में नंदी की ये प्रतिमा और सामंत राजा की ये प्रतिमा ही दिखायी दे रही थी....जैसे जैसे खुदाई होती गयी....डीपाडीह का इतिहास भी सामने आता गया....

सरगुजा में यूं तो पर्यटन की अपार संभावनायें है...लेकिन इनमें से डीपाडीह की खूबसूरत संरचना की बात ही कुछ और है....नदी के किनारे,पहाड़ों के बीच में और तालाब के साथ जुड़ी हुयी सदियों पुरानी प्रतिमायें भारत का इतिहास बताने के साथ ही पर्यटन के नये आयाम भी तय करती है....

छत्तीसगढ़ का जनजातीय बाहुल्य जिला सरगुजा के सीमांत क्षेत्र में बसा डीपाडीह पुरा संपदा के लिहाज से छत्तीसगढ़ का सबसे समृद्ध और महत्तवपूर्ण एतिहासिक स्थल है...चारों ओर से पहाड़ी श्रंखला और सरना के वृक्ष के जंगलों से घिरा हुयी ये जगह प्राकृतिक सौंदर्य के लिहाज से भी बेजोड़ है...
डीपाडीह अंबिकापुर,कुसमी मार्ग पर 72 किलोमिटर की दूरी पर स्थित है...सन् 1988 में डीपाडीह के प्राचीन पत्थरों को हजारों जाने और फिर मिट्टी की खुदाई के बाद यहां से अनेक प्राचीन और दुर्लभ कलाकृतियां दुनिया के सामने निकलकर आयी...

डीपाडीह अब एक महत्वपूर्ण पुरावत्व और पर्यटन केन्द्र के रुप में प्रसिद्ध है....डीपाडीह के इस मंदिर को सामंत सरना के नाम से जाना जाता है......यहां पर अलग अलग समूहों में कई मंदिरों के खंडित अवशेष है....लेकिन इन सबमें ये शिव मंदिर और अनेक प्रकार के छोटे बड़े आकार के मंदिर स्थित है....सामंत सरना के प्रमुख शिव मंदिर के प्रवेश द्वार की कलाकृति बेहद ही कलात्मक है....जिसमें लक्ष्मी विराजमान है...
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास के नवनिर्माण में डीपाडीह से ज्ञात स्थापना कला शैली,मूर्ति शिल्प और अभिलेखों का विशेष महत्व है...यहां की मूर्तियों को सहेजकर मूर्तिशाला में रखा गया है....इनमें से भैरव,ब्रहमा,कालमहेश्वर,गणेश,सूर्य और चामुंडा भाव महिमा के लिहाज से बेहद ही संतुलित दिखायी देती है....डीपाडीह के प्राचीन स्मारक स्थल राजा शासन के द्वारा संरक्षित है और इसके विकास और सुंदरता के साथ सुरक्षा के लिहाज से भी लगातार प्रयास किये जा रहे है...

डीपाडीह के सामंत सरना की सबसे बड़ी खासियत भगवान शिव का मंदिर और उनके द्वारपाल है....शायद ही एसा कही देखने को मिला हो कि मंदिर के चारों कोनो में चार अलग अलग देवता विराजमान हो...सामंत सरना में एसी ही संरचना खुदाई के बाद मिली है...इसके साथ ही यहां का सामंती इतिहास भी पर्यटकों को अपनी तरफ खींच लाता है...
डीपाडीह में पर्यटन की संमावजायें सन् 1989 में तलाशी गयी थी जब नंदी की इस प्रतिमा के सामने खुदाई की गयी और वहां से ये विशाल शिवलिंग मिला...जैसे जैसे पत्थर और मिट्टी हटाते गये इतिहास के झरौखों से निकलकर ये वैभवशाली प्रतिमाये भी 20वीं सदी में सबको दिखने लगी...तकरीबन एक दशक की खुदाई के बाद पुरातत्व विभाग ने यहां के मंदिरों को चार समूहों बांट दिया...इनमें सबसे पहला और महत्वपूर्ण समूह है सामंत सरना...इस समूह में एक विशाल खंदिव शिवमंदिर,चामुंड्डा मंदिर और छोटे बड़े आकार के पंतीबद्ध मंदिर स्थित है...इस मंदिर के द्वार पर गंगा और यमुना नदी देवियां खड़ी है...मंदिर में मंडप के एक कोनं में मोर की सवारी करते कार्तिकेय,दूसरी तरफ गणेश,तीसरी तरफ सोलह भुजी विष्णु और चौथी तरफ महिषासुर मर्दिनी मां नवदुर्गा की प्रतिमा स्थित है...जो 10वी शताब्दी की शिव महिमा को खुद ही वर्णित करती है....

प्राचीन मंदिरों का दूसरा समूह बीरजा टीला के नाम से जाना जाता है इस समूह में सूर्य देवता को प्रमुख माना गया है....इस मंदिर के पास ही तात्कालीन आवासीय मठों के अवशेष भी मौजूद है...तीसरे समूह के रुप में रानी पोखर मंदिर समूह है...इसमें चार मंदिर थे...लेकिन अब सिर्फ चबूतरे ही शेष रह गये है...पुरानी किवंदती के अनुसार इसी तलाब में तीन रानियों ने सामूहिक जल समाधि ली थी....इसके अलावा चौथे समूह में उरांव टोला मंदिर समूह है जिसके निर्माण 8वीं सदी का माना जाता है...यहां पर गडे हुये स्तंभों में देव प्रतिमाये,मिथुन युगल और नायिकाओं की प्रतिमाये अंकित है....
भगवान शिव के इस विशाल मंदिर के पास ही वर्गकार चबूतरे पर चमुण्डा मंदिर के भग्न अवशेष स्थित है...सोमवंशी,बंगाल और मगध के पालवंशी राजाओं के अलावा त्रिपुरी के कलचुरी राजाओं के बनवाये गये अवशेषों का भी इस जगह पर भरमार है...माना जाता है कि प्राचीन काल में इन मूर्तियों का निर्माण भी यही पर होता था...

दक्षिण कौसल की अमुल्य पुरा सम्पदा से संपन्न और गौरवमय इतिहास से परिपूर्ण डीपाडीह की सांस्कृतिक विरासत भारतीय कला के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है...यही वजह है कि पर्यटक डीपाडीह में खिंचे चले आते है...डीपाडीह ने सार्थिक सुंदरता और प्राकृतिक काया को देखकर हर कोई इसे सरगुजा का सर्वेश्रेठ पर्यटन स्थल कहता है....

रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में भी सरगुजा का उल्लेख है....दक्षिण कौशल का ये भूभाग पाटलीपुत्र से जगन्नाथपुरी तक जाने का मुख्य मार्ग था....साथ ही पुराणों के अनुसार भगवान राम ने अपने 14 सालों के वनवास का कुछ समय सरगुजा में भी बिताया था...
लगभग 22 हजार 237 वर्ग फीट में फैला सरगुजा मूल रुप से आदिवासी पंडो पहाड़ी कोरवा जैसी जनजातियों के लिये जाना जाता है...सरगुजा का 50 फीसदी हिस्सा जंगलों और पहाड़ो से घिरा हुआ है...इन्हीं पहाड़ो के बीच शंकरगढ़ से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है डीपाडीह जो पर्यटकों के आकर्षण का एक बड़ा केन्द्र है....

सरगुजा को प्राचीन काल से ही देवताओं की स्थली माना जाता है....इसकी वजह भी है...सरगुजा के प्रत्येक कोने में एक बड़े देवता का मंदिर है...फिर चाहे वो अंबिकापुर में मां महामाया हो,कुदरगढ़ में मां दुर्गा हो या फिर उदयपुर में रामसीता गुफा हो........साथ ही डीपाडीह का ये प्राचीन शिवमंदिर तो अपने आप में एक विरासत को समेटे हुये है ही....यही वो खूबियां है जो ना सिर्फ पर्यटकों को यहां पर खींच लाती है बल्कि उन्हें दुबारा लौटकर आने को भी मजबूर करती हैं कि काश.....................

Saturday, 26 September 2009

बालको.....ये तूने क्या किया.............


२३ सितम्बर २००९, दोपहर के ०३:२७ बजे.....मैं कोरबा में था.....वैसे तो कोरबा आने का पहले से कोई प्रोग्राम नहीं था......लेकिन ना जाने क्यों एक काम जो काफी दिन से लटका हुआ था, उसे पूरा करने की इच्छा हुयी और मैं एक दिन की छुट्टी लेकर कोरबा आ गया था......सुबह काम निपटाकर खाली होन के बाद कोरबा के पुराने पत्रकारों से मिलने की इच्छा हुयी......सबसे पहले मैं कमलेश यादव(संपादक , सीसीएन अभीतक) के दफ्तर पहुँचा.....यहां कुछ बातें चल ही रही थी कि मौसम खराब हो गया....हम चाय की चुस्कियां लेते हुए पुराने दिनोंको याद करते हुए नये के बारे में विचार कर रहे थे......इतनी देर में कमलेश यादव का फोन बजा और खबर आयी की बालको की एक चिमनी गिर गयी है.....वैसे ये कोई नयी बात नहीं थी....जब भी कोरबा में आंधी और तुफान आता है राख और धूल के गुबार सब कुछ अपने भीतर समेट लेते हैं.....इस बार भी हमने यही समझा की कोई मजाक कर रहा है....लेकिन इसके दो मिनट बाद ही मेरा भी मोबाइल बज उठा और वही बात दोहरायी गयी.....आखिर हम ठहरे खबरनवीस....लिहाजा मजाक की भी छानबीन करनी पड़ती है.....मैने बालको प्लांट मे काम करने वाले अपने एक दोस्त को फोन लगाया और खबर के बारे में पूछा......उसने जो कुछ भी बताया, उस पर ।यकीन करना काफी मुश्किल था........वो स्पाट पर खड़ा था और उसके हिसाब से कम से कम दो सौ लोगों की मलबे में दबने की खबर थी......खबर की पुष्टि होते ही कोरबा में हाहाकार मच गया.....मैं छुट्टी पर था...लेकिन एक पत्रकार का मन भला कहां शान्त रह सकता है...लिहाजा कमलेश यादव के साथ मैं भी हो लिया......रास्ते भर हम इसी बारे में चर्चा करते रहे और तकरीबन २० मिनट बाद जब हम घटना स्थल पर पहुँते तो हमारे भी होश उड़ गये...........२०० मीटर उंची निर्माणाधीन चिमनी जमींदोज हो चुकी थी और उसके मलबे में गाजर मूली की तरह लाशें दबी हुयी थी...........


वैसे तो किसी को पता नहीं था कि मैं कोरबा मे हूँ...लेकिन कैरियर के दो साल कोरबा मे बिताने के बाद आज भी लोग बड़ी खबरों के लिए मुझे याद कर ही लेते हैं.....इस बार भी एसा ही हो रहा था.....स्पाट पर पहुँचने के बाद मुझे अपने चैनल का रिपोर्टर कहीं नजर नहीं आया ,लिहाजा मैने डेस्क पर फोन करके मामले की जानकारी दी और मजदूरों के मरने की पुष्टि की.....इसके बाद फिर डेस्क ने भी मुझे आराम नहीं करने दिया.....आया तो था मैं छुट्टी मनाने लेकिन यहां भी काम ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा........


खैर मुछे लगा की अगर मैं आज कोरबा में नहीं होता तो मुझे काफी अफसोस होता.......हिन्दुस्तान की औद्योगिक दुर्घटनाओँ के इतिहास की ये सबसे बड़ी और दुःखद घटना थी......जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा और महसूस किया......


बालको अपनी १२०० मेगावाट के विस्तार परियोजना पर काम कर रहा था और इसका ग्लोबल टेंडर उसने चाइना की कंपनी सेपको को दे रखा सेपको ने भी चिमनी बनाने का काम देशी कंपनी ग्द्क्ल को पेटी कांट्रेक्ट के रुप में सौंप दिया था.....इस संयंत्र में २७५ मीटर उंचाई की दो चिमनियां बननी थी...दोनों चिमनियां २०० मीटर की उँचाई तक पूरी हो चुकी थी.....घटना के दिन भी चिमनी बनाने का काम चल रहा था और इस काम में १५० मजदूर लगे हुए थे....चिमनी गिरने से कुछ मिनट पहले ही जोरदार बारिश शुरु हो गयी थी.....बारिश से बचने के लिए सभी मजदूर पास में ही बने स्टोर रुम और कैंटीन मे चले गये थे......लेकिन किसे पता था की वो मौत के मुंह में जा रहे हैं..........थोड़ी ही देर बाद भुस्स की एक आवाज आयी और फिर एसा लगा मानों भूकम्प आ गया हो......जो बच गये उनके हलक सूख गये मानों वो गूंगे हों और जो चपेट मे आ गये उनमें से कोई भी जिन्दा नहीं बच सका.....पहले दिन किये गये राहत कार्य में कुल २२ लाशें मिली......घटना के बाद वहां पर ना तो कोई चाइनीज था और ना ही कोई जीडीसीएल का अधिकारी........लेकिन ना जाने कहां से मजदूरों को जीड़ीसीएल का एक कर्मचारी दिख गया, वो तेजी से बाहर की तरफ भाग रहा था, फिर क्या था...अपनों को को चुके मजदूरों को कर्मचारी की ये हरकर बर्दास्त नहीं हुयी और वो भीड़ का शिकार होगया......मरने वालों की संख्या मे एक और इजाफा हो गया.......


आज मैं घटना के चार दिन बीत जाने के बाद ये ब्लाग लिख रहा हूँ, इस दौरान ४४ लोगों के मौत की पुष्टी हो चुकी है जबकि १४ लापता की सूची में डाल दिये गये हैं......कुल मिलाकर अभी भी राहत कार्य जारी है और ये संख्या शतक तक पहुँचने का माद्दा रखती है......वैसे भी बालको की मृतकों के परिवार को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा के साथ ही मृतकों की संख्या बढ़ाने मे काफी कंजूसी बरती जा रही है.......


आपको ये भी बतादें की जिस जगह पर बाल्को अपने १२०० मेगावाट का पावर प्लांट बना रहा है, वहां की इन्वायरमेंट क्लीयरेंस अभी तक बालको को नहीं मिली है.......साथ ही ये जगह नगर निगम के क्षेत्र में आती है और चिमनी निर्माण से पहले या बाद में भी बालको ने निगम से इसके निर्माण की अनुमति नहीं ली है......इसकी वजह से कई बार यहां का काम बंद करने के लिए बालको को नोटिस भी दी गयी लेकिन निर्माण कार्य अनवरत चलता रहा.....नियमों को ताक पर रखकर अब जब ये निर्माण कार्य सैकड़ों मजदूरों की बलि ले चुका है तो विपक्ष प्रेस कांफ्रेंस कर जांच करने के लिए अपना विधायक दल गठित कर रहा है.........

अगर नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे तो ये बात पहले से ही पता थी तो विपक्ष ने हादसे के पहले ही ये मुद्दा क्यूं नहीं उठाया, अब मामले की जांच करवाकर क्या होने वाला है, मरने वाले तो मर गये.......


इससे पहले भी ठेका कंपनी जीडीसीएल सीएसईबी की ५०० मेगावाट की ईस्ट विस्तार परियोजना में भी इसी तरह की घटना को अंजाम दे चुकी है जिसमें कोल हापर का स्लैब ढहने से तीन मजदूरों की समाधि बन गयी थी और अगले ही दिन पूरा पावर प्लांट आग की भेंट चढ़ा दिया गया था....उस वक्त संजय गर्ग कलेक्टर और हिमांशू गुप्ता कोरबा के एस पी थे......उस वक्त भी कांग्रेस ने भूपेश बघेल की अगुवाई में एक विधायक दल बना कर जांच की थी और आज दो साल बीत जाने के बाद भी उस जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो सकीहै, या ये कहें की बनी ही नहीं है........


बहरहाल किसी भी राज्य के विपक्ष का काम है राजनीति करना भले ही वो लाशों पर क्यों ना हो....तो छत्तीसगढ़ मे भी हो रहा है तो भला क्या बुरा है........


लेकिन उस बालको को कौन समझाये जो अपने मुनाफे के लिए मासूम ज़िंदगियों के साथ लगातार खिलवाड़ कर रहा है.......पहले तो बालको रे रेडमंड प्लांट ने कई गांवों को बंजर बना दिया और मवेशियों की समाधि बना दी, उसके बाद सरगुजा के मैनपाट को बाक्साइट के लिए उजाड़ दिया और अब अपने ही घर में मजदूरों की कब्र खोद दी............इस दर्दनाक घटना के बाद अब हर किसी के ज़ुबान पर बस यही है कि बालको............ये तूने क्या किया...................



Saturday, 18 July 2009

चौबे जी और रायपुर के वो दिन.........



रायपुर मे पत्रकारिता शुरु की तो पुलिस के बारे मे एक अलग सा ख़याल ज़ेहन मे कौंधता रहता था.....दरअसल मैंने उत्तर प्रदेश की पुलिसिंग को ही शुरु से देखा था.....लेकिन जब रायपुर के स्थानीय लोकल चैनल मे बतौर क्राइम रिपोर्टर के हैसियत से आना जाना शुरु किया तो पुलिस कंट्रोल रुम मे बारी बारी से सभी पुलिस अधिकारियों से जान पहचान बनी.......साल २००६ मे रायपुर मे प्रशान्त ठाकुर, प्रखर पांडेय, राजेश अग्रवाल और बी बी एस राजपूत सी।एस।पी। के रुप मे शहर को संभाले हुए थे......लेकिन इन सबको संभालने वाला एक शख़्स और था जो पुलिस कंट्रोल रुप के पहले माले पर अपने चैंबर मे बैठ कर फरियादियों की बातें सुना करता था और फिर अपने इन चार जांबाज सिपहसलारों को पीड़ितों को न्याय दिलाने का काम सौंपता था.......

मेरी वी के चौबे से पहली मुलाकात उनके चैंबर मे ही हुयी थी....उस वक्त मैं रायपुर के लिए नया था....लेकिन मेरा कैमरामैन स्थानीय था और चौबे जी के व्यवहार से अच्छी तरह वाकिफ था......उसी दिन मुझे चौबे जी के चाहने वालों की फेहरिस्त का अनुमान हो गया था......चौबे जी के पास नोकिया का नया मल्टीमीडिया हैंड सेट था जिसमे कम से कम २००० फोन नं स्टोर होते हैं, लेकिन मेरा कैमरामैन जो चौबे जी को कई सालों से जानता था वो अपना नं चौबे जी के मोबाइल मे दर्ज नहीं करा पाया था.....दरअसल चौबे जी का फोनबुक फुल था औऱ नये नंबरों के लिए उसमे जगह नहीं थी......मेरी उनसे कुछ खास बातचीत नहीं हुयी....एक खबर के लिए बाइट लेनी थी.....पहले तो उन्होने मना किया फिर मान गये.......जाते वक्त उन्होने फिर से बैठने को कहा और फिर अपने अर्दली से कुछ ठंढा लाने को कहा.......अप्रेल का महीना था, गर्मी पड़ रही थी.....अर्दली के हाथों से प्याला लेकर जब मैने अपने होठों से लगाया तो पता चला जिसे मैं कोल्ड ड्रिंक समझ रहा था वो दरअसल जलजीरा था जिसे चौबे जी ने विशेष रुप से तैयार करक अपने फ्रीज मे रखवाया था......फिर क्या था, खबर हो ना हो, जलजीरा पीने का ये सिलसिला अगस्त महीने तक चलता रहा.....मैं खुसकिस्मत था कि चौबे जी ने अपने मोबाइल से कुछ पुराने नंबर हटा दिये और खाली जगह मे मुझे फिट कर लिया.........इन छः महीनों मे कभी भी एसा नहीं लगा कि मैं एक पुलिस अधीक्षक के साथ हूँ, उनका व्यवहार ठीक वैसा ही था जैसा की मेरे किसी हमउम्र का होता......

अप्रेल २००६ की बात है.....पूरे देश मे बर्ड फ्लू का प्रकोप था......हालांकि छत्तीसगढ़ इस बीमारी से प्रभावित नहीं था.......नवभारत के फ्रंट पेज मे एक खबर छपी......इसमे महाराष्ट्र के जलगांव मे बर्ड फ्लू की चपेट मे आने से एक व्यक्ति की मौत की खबर दो कालम मे लगी थी..........इसको लेकर रायपुर के पोल्ट्री व्यवसायी आक्रोशित हो गये.........मैं उस वक्त पुलिस कंट्रोल रुप मे ही खड़ा था....नीचे चौबे जी की गाड़ी खड़ी थी और बाकी पुलिस वाले इधर उधर भाग रहे थे....मैने उपर जाने की सोची.....तभी गाड़ी मे लगा वायरलेस सेट बज उठा.....प्रशान्त ठाकुर कह रहे थे कि नवभारत को घेर लिया गया है औऱ तोड़फोड़ शुरु हो गयी है......मैने अपनी बाइक मोड़ी और तुरंत नवभारत प्रेस के लिए रवाना हो गया.....मैं आगे आगे चल रहा था और वी के चौवे पीछे पीछे आ रहे थे.......घटना स्थल पर पहुँच कर मैने कैमरा रोल करवाया ही था कि मेरे कानों मे लाठियों की आवाजें गूंजने लगी.....मैं भी भीड़ के बीच मे खड़ा था....भाग कर एक पेड़ के नीचे खड़ा हुआ और फिर देखा की लाठी चार्ज हो रहा है और व्यवसायिओं कीतरफ से पत्थर चल रहे हैं......लेकिन अगले दो मिनट मे एक भी उपद्रवी नवभारत के मीलों दूर तक नजर नहीं आ रहा था.......व्यापारियों के द्वारा ये हमला प्रेस की स्वतंत्रता पर किया गया था.....लेकिन चौबे जी ने अपने कुशल नेतृत्व क्षमता से सारी परेशानी को चुटकी मे दूर कर दिया और प्रेस के अंदर बंधक बने सभी कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया.....इस घटना के एक्सक्लूसिव फुटेज मेरे पास थे.......बाद मे मेरे रायपुर से तबादले और उसके बाद जब भी उनसे फोन पर बातचीत हुयी वो हमेशा कहते रहे..."......यार तुम वहां मुझ से पहले कैसे पहुँच गये......तुम तो मेरे आफिस के नीचे खड़े थे....मैं तुम्हें देख रहा था......." चौबे जी के इन शब्दों मे प्यार और सम्मान की मिठास घुली रहती थी......मैं भी बदले मे कह देता था..... " सर जी आप जलजीरा पिलाओगे तो आउंगा.......इस पर चौबे जी कहते की मुझे भी कोरबा बुला लो, तो पिला दुँगा..........चौबे जी का ये व्यवहार एक बच्चे से लेकर बड़े बूढ़े तक को उनका फैन बना देता था और जो कोई भी एक बार उनके करीब से गुजरा होगा वो शायद ही कभी उन्हें भूल पाया हो.......
इस वक्त छत्तीसगढ़ मे एसे कई आई पी एस हैं जो चौबे जी के द्वारा प्रशिक्षित किये गये हैं और चौबे जी की शहादत के बाद इनमे से हर एक के आंखों मे आंसू थे......
आज मैं उन दिनों को याद करके खुद को रोने से नहीं रोक पा रहा हूँ.....तीन साल पहले की वो मुलाकातें आज भी मेरे जेहन मे कौंध रही हैं......एसा लगता है जैसे अभी उनका फोन आयेगा और वो प्यार से कहेंगे, ....क्या भाई आज कल तो तुम्हारे मैसेज भी नहीं आते हैं.......
आपकी शहादत को सलाम.......
काश............