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Saturday, 18 July 2009

चौबे जी और रायपुर के वो दिन.........



रायपुर मे पत्रकारिता शुरु की तो पुलिस के बारे मे एक अलग सा ख़याल ज़ेहन मे कौंधता रहता था.....दरअसल मैंने उत्तर प्रदेश की पुलिसिंग को ही शुरु से देखा था.....लेकिन जब रायपुर के स्थानीय लोकल चैनल मे बतौर क्राइम रिपोर्टर के हैसियत से आना जाना शुरु किया तो पुलिस कंट्रोल रुम मे बारी बारी से सभी पुलिस अधिकारियों से जान पहचान बनी.......साल २००६ मे रायपुर मे प्रशान्त ठाकुर, प्रखर पांडेय, राजेश अग्रवाल और बी बी एस राजपूत सी।एस।पी। के रुप मे शहर को संभाले हुए थे......लेकिन इन सबको संभालने वाला एक शख़्स और था जो पुलिस कंट्रोल रुप के पहले माले पर अपने चैंबर मे बैठ कर फरियादियों की बातें सुना करता था और फिर अपने इन चार जांबाज सिपहसलारों को पीड़ितों को न्याय दिलाने का काम सौंपता था.......

मेरी वी के चौबे से पहली मुलाकात उनके चैंबर मे ही हुयी थी....उस वक्त मैं रायपुर के लिए नया था....लेकिन मेरा कैमरामैन स्थानीय था और चौबे जी के व्यवहार से अच्छी तरह वाकिफ था......उसी दिन मुझे चौबे जी के चाहने वालों की फेहरिस्त का अनुमान हो गया था......चौबे जी के पास नोकिया का नया मल्टीमीडिया हैंड सेट था जिसमे कम से कम २००० फोन नं स्टोर होते हैं, लेकिन मेरा कैमरामैन जो चौबे जी को कई सालों से जानता था वो अपना नं चौबे जी के मोबाइल मे दर्ज नहीं करा पाया था.....दरअसल चौबे जी का फोनबुक फुल था औऱ नये नंबरों के लिए उसमे जगह नहीं थी......मेरी उनसे कुछ खास बातचीत नहीं हुयी....एक खबर के लिए बाइट लेनी थी.....पहले तो उन्होने मना किया फिर मान गये.......जाते वक्त उन्होने फिर से बैठने को कहा और फिर अपने अर्दली से कुछ ठंढा लाने को कहा.......अप्रेल का महीना था, गर्मी पड़ रही थी.....अर्दली के हाथों से प्याला लेकर जब मैने अपने होठों से लगाया तो पता चला जिसे मैं कोल्ड ड्रिंक समझ रहा था वो दरअसल जलजीरा था जिसे चौबे जी ने विशेष रुप से तैयार करक अपने फ्रीज मे रखवाया था......फिर क्या था, खबर हो ना हो, जलजीरा पीने का ये सिलसिला अगस्त महीने तक चलता रहा.....मैं खुसकिस्मत था कि चौबे जी ने अपने मोबाइल से कुछ पुराने नंबर हटा दिये और खाली जगह मे मुझे फिट कर लिया.........इन छः महीनों मे कभी भी एसा नहीं लगा कि मैं एक पुलिस अधीक्षक के साथ हूँ, उनका व्यवहार ठीक वैसा ही था जैसा की मेरे किसी हमउम्र का होता......

अप्रेल २००६ की बात है.....पूरे देश मे बर्ड फ्लू का प्रकोप था......हालांकि छत्तीसगढ़ इस बीमारी से प्रभावित नहीं था.......नवभारत के फ्रंट पेज मे एक खबर छपी......इसमे महाराष्ट्र के जलगांव मे बर्ड फ्लू की चपेट मे आने से एक व्यक्ति की मौत की खबर दो कालम मे लगी थी..........इसको लेकर रायपुर के पोल्ट्री व्यवसायी आक्रोशित हो गये.........मैं उस वक्त पुलिस कंट्रोल रुप मे ही खड़ा था....नीचे चौबे जी की गाड़ी खड़ी थी और बाकी पुलिस वाले इधर उधर भाग रहे थे....मैने उपर जाने की सोची.....तभी गाड़ी मे लगा वायरलेस सेट बज उठा.....प्रशान्त ठाकुर कह रहे थे कि नवभारत को घेर लिया गया है औऱ तोड़फोड़ शुरु हो गयी है......मैने अपनी बाइक मोड़ी और तुरंत नवभारत प्रेस के लिए रवाना हो गया.....मैं आगे आगे चल रहा था और वी के चौवे पीछे पीछे आ रहे थे.......घटना स्थल पर पहुँच कर मैने कैमरा रोल करवाया ही था कि मेरे कानों मे लाठियों की आवाजें गूंजने लगी.....मैं भी भीड़ के बीच मे खड़ा था....भाग कर एक पेड़ के नीचे खड़ा हुआ और फिर देखा की लाठी चार्ज हो रहा है और व्यवसायिओं कीतरफ से पत्थर चल रहे हैं......लेकिन अगले दो मिनट मे एक भी उपद्रवी नवभारत के मीलों दूर तक नजर नहीं आ रहा था.......व्यापारियों के द्वारा ये हमला प्रेस की स्वतंत्रता पर किया गया था.....लेकिन चौबे जी ने अपने कुशल नेतृत्व क्षमता से सारी परेशानी को चुटकी मे दूर कर दिया और प्रेस के अंदर बंधक बने सभी कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया.....इस घटना के एक्सक्लूसिव फुटेज मेरे पास थे.......बाद मे मेरे रायपुर से तबादले और उसके बाद जब भी उनसे फोन पर बातचीत हुयी वो हमेशा कहते रहे..."......यार तुम वहां मुझ से पहले कैसे पहुँच गये......तुम तो मेरे आफिस के नीचे खड़े थे....मैं तुम्हें देख रहा था......." चौबे जी के इन शब्दों मे प्यार और सम्मान की मिठास घुली रहती थी......मैं भी बदले मे कह देता था..... " सर जी आप जलजीरा पिलाओगे तो आउंगा.......इस पर चौबे जी कहते की मुझे भी कोरबा बुला लो, तो पिला दुँगा..........चौबे जी का ये व्यवहार एक बच्चे से लेकर बड़े बूढ़े तक को उनका फैन बना देता था और जो कोई भी एक बार उनके करीब से गुजरा होगा वो शायद ही कभी उन्हें भूल पाया हो.......
इस वक्त छत्तीसगढ़ मे एसे कई आई पी एस हैं जो चौबे जी के द्वारा प्रशिक्षित किये गये हैं और चौबे जी की शहादत के बाद इनमे से हर एक के आंखों मे आंसू थे......
आज मैं उन दिनों को याद करके खुद को रोने से नहीं रोक पा रहा हूँ.....तीन साल पहले की वो मुलाकातें आज भी मेरे जेहन मे कौंध रही हैं......एसा लगता है जैसे अभी उनका फोन आयेगा और वो प्यार से कहेंगे, ....क्या भाई आज कल तो तुम्हारे मैसेज भी नहीं आते हैं.......
आपकी शहादत को सलाम.......
काश............

Saturday, 11 July 2009

क्या मै संतुष्ट हुँ......

आज शूट से लौटने के बाद आफिस मे कम्प्यूटर के कीबोर्ड से खेल रहा था.....उंगलियां चल रहीं थी और एक कोरा कागज काले रंग की स्याही से स्कृप्ट का रुप लेता जा रहा था...हर लाइन लिखने के बाद उसे दो बार दुहरा रहा था......दरअसल पहले एसा नहीं था लेकिन अब समय बदल गया है.....गलती से भी कुछ एसा लिख दिया जिससे किसी के खिलाफ होने की महक हो तो कुछ ही देर बात बगल मे दैत्य रुपी मोबाइल बज उठता है....चाह के भी बंद नहीं कर सकते.....तब भी नहीं जब अपने प्रियसी के साथ दो पल फुर्सत के बिताने का लम्हा बड़ी मुश्किल से मिले.....सोचता हूँ काश.....कुछ एसा होता की एक पल के लिए ही सही इस काले अंधेरे से थोड़ी देर के लिए उजाले मे जी लूँ.......
सिर्फ सोचता ही रह जाता हूँ, कर नहीं पाता.......एक असाइनमेंट पूरा होता नहीं की दूसरे के लिए आदेश आ जाता है.......कर भी क्या सकते हैं.......नौकरी तो बजानी ही पड़ेगी.....लेकिन इन सबके बीच दिल से यही आवाज़ निकलती है कि क्या मैं संतुष्ट हूँ.......ना जाने क्यूँ आज पुराने लोगों की याद आ रही है मेरे सफर मे साथ थे लेकिन एक एक करके साथ छूटता चला गया और साथ ही नये लोग साथ आते गये.....फिर भी नये लोगों ने ना तो वो बात है और ना ही वो उमंग का अहसास जो मेरे मूड के अपसेट होने पर चुटकी मे उसका समाधान निकालकर इस सांवले चेहरे पर मुस्कुराने की वजह पैदा कर देते थे..........
पुराने दिन तो वापस नहीं आ सकते लेकिन पुराने दोस्तों के वापस लौटने का इंतजार जरुर करता हूँ.......
काश............