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Saturday, 11 July 2009

क्या मै संतुष्ट हुँ......

आज शूट से लौटने के बाद आफिस मे कम्प्यूटर के कीबोर्ड से खेल रहा था.....उंगलियां चल रहीं थी और एक कोरा कागज काले रंग की स्याही से स्कृप्ट का रुप लेता जा रहा था...हर लाइन लिखने के बाद उसे दो बार दुहरा रहा था......दरअसल पहले एसा नहीं था लेकिन अब समय बदल गया है.....गलती से भी कुछ एसा लिख दिया जिससे किसी के खिलाफ होने की महक हो तो कुछ ही देर बात बगल मे दैत्य रुपी मोबाइल बज उठता है....चाह के भी बंद नहीं कर सकते.....तब भी नहीं जब अपने प्रियसी के साथ दो पल फुर्सत के बिताने का लम्हा बड़ी मुश्किल से मिले.....सोचता हूँ काश.....कुछ एसा होता की एक पल के लिए ही सही इस काले अंधेरे से थोड़ी देर के लिए उजाले मे जी लूँ.......
सिर्फ सोचता ही रह जाता हूँ, कर नहीं पाता.......एक असाइनमेंट पूरा होता नहीं की दूसरे के लिए आदेश आ जाता है.......कर भी क्या सकते हैं.......नौकरी तो बजानी ही पड़ेगी.....लेकिन इन सबके बीच दिल से यही आवाज़ निकलती है कि क्या मैं संतुष्ट हूँ.......ना जाने क्यूँ आज पुराने लोगों की याद आ रही है मेरे सफर मे साथ थे लेकिन एक एक करके साथ छूटता चला गया और साथ ही नये लोग साथ आते गये.....फिर भी नये लोगों ने ना तो वो बात है और ना ही वो उमंग का अहसास जो मेरे मूड के अपसेट होने पर चुटकी मे उसका समाधान निकालकर इस सांवले चेहरे पर मुस्कुराने की वजह पैदा कर देते थे..........
पुराने दिन तो वापस नहीं आ सकते लेकिन पुराने दोस्तों के वापस लौटने का इंतजार जरुर करता हूँ.......
काश............

2 comments:

  1. nice artical......actually as humen being we are very bound with our sweet memory like old friend and other heartly relate people...but reality is very differ from this imaginari thing....child does not know about any good ar bad thing so he that an innocent creation of the god like this we were also as an innocent who din't know at the time....therefar we understood it all old is gold...and when we actualize something then every moment become like an sweet imagin.....god sir jee all the best....

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  2. हर किसी की व्यथा यही है मेरे दोस्त......

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